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Friday, 17 August 2012

न्यायतंत्र हारा......गुन्हगार जीता ??

क्या कानून में बदलाव जरुरी है ??

एक युवती जो आत्महत्या करती है.........
एक व्यक्ति जो ह्त्या की  शंका से घिरे है........
कानून अधिकार देता है उसे किसी भी स्तर पर अग्रिम जमानत की याचिका दायर करने का......
न्यायतंत्र, लोकतंत्र में सबसे ऊपर है या शंका के दायरे में होते हुवे कोई व्यक्ति.....
न्यायतंत्र स्वाभाविक रूपसे राष्ट्र की जनता के  भरोषा का ऐक मंदिर है.......
लेकिन.........
हम देखते रहे........
हम सुनते रहे.......कानून की शंका के दायरे में जो व्यक्ति है वो अपना काम करते रहेता है और कानून भी उसे सुनता रहता है.....
आज की ही घटना के मुताबिक़ ऐक राजकारणी जिस पर ह्त्या में परोक्ष रूप से दोषी होने की शंका है उसकी अग्रिम जमानत की अरजी पर हाईकोर्ट ने कार्यवाही की......
अग्रिम जमानत की अरजी खारिज हुई........लेकिन गुन्हागार अब भी फरार......देश में या विदेश में ? क्या ऐक भगेडू की आवाज सुनना कानून में आवश्यक रखना जरुरी है ?
अग्रिम जमानत याचिका उसका अधिकार है.......लेकिन क्या कानून यह परिवर्तन नहीं चाहता की अदालते अपना फैसला सुनाने के वख्त गुनहगार को अदालत में हाजिर रहेने के आदेश दे और फैसले के मुताबिक़ पुलिस कार्यवाही आगे चले ?
आज शायद न्यायतंत्र हारा है........
न्यायतंत्र के फैसले के मुताबिक़ संकाशील व्यक्ति की अग्रिम जमानत अरजी खारिज होने पर भी गुनहगार फरार है.......
क्या मतलब यह फैसले का......
न्याय कैसे होगा......
आप क्या चाहते है ? क्या कानून में बदलाव जरुरी नहीं ?

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